Thursday, February 15, 2018

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गैर मर्द से जिस्मानी रिश्ता-Indian Sex Stories

indian sex stories
दोस्तो, मेरा नाम नसीम खान है, मैं एक सीधी सादी हाऊसवाइफ हूँ, जो हमेशा घर के कामकाज या पति और बच्चों की देखभाल में ही लगी रहती है. मेरी उम्र 33 साल है, हाइट 5 फीट 3 इंच, वजन 60 किलो, रंग गोरा, काफी खूबसूरत हूँ. मेरी शादी को 12 साल हो गए हैं, मेरे पति का नाम शहजाद खान है, उनकी उम्र 36 साल है, वो एक फार्मा कंपनी में सुपरवाइजर हैं. हम दिल्ली में रहते हैं. मेरे 2 बच्चे हैं, बड़ा बेटा 10 साल का है, उसका नाम साहिल है और छोटी बेटी है, जो अभी 5 साल की है, उसका नाम समीना है, उसे हम प्यार से गुड्डी बुलाते हैं.
हमारा घर काफी बड़ा है, दो मंजिला है. इतने बडे घर में हम चार लोग ही रहते हैं.

बचपन से ही एक रूढ़िवादी और नियम की पक्की यानि कट्टर फैमिली में पली बढ़ी होने की वजह से मैंने कभी किसी लड़के की तरफ नजर उठा कर नहीं देखा और ना ही शादी से पहले मेरा कोई अफेयर रहा. मैं घर से बाहर हमेशा बुरके में ही निकलती हूँ और घर में भी ज्यादातर रुमाली या फुल साईज दुपट्टे में ही रहती हूँ.

मेरे पहले हम बिस्तर मेरे शौहर शहजाद ही थे, हम एक दूसरे से बहुत प्यार भी करते हैं और वो मुझ पर भरोसा भी करते हैं. मेरे पति मुझे हर तरह की खुशी देते हैं. मुझे कभी किसी बात की कमी नहीं होने दी, फिर भी मेरी जिंदगी ने कुछ ऐसा मोड़ लिया, जो मैंने कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा था. जिसमें मैंने अपने शौहर का भरोसा तोड़ दिया.

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बात आज से 6 महीने पहले की है, एक दिन रात को खाना खाते वक़्त शहजाद ने मुझसे कहा कि नसीम क्यों ना हम अपना ऊपर वाला कमरा किराये पर दे दें?
मैं- क्यों.. किस लिए?
शहजाद- अरे कुछ नहीं, बस ऐसे ही… मेरे ऑफिस में एक नया लड़का आया है.. संजय शर्मा, वो अमृतसर से है, उसका ट्रान्सफर दिल्ली में हुआ है और बेचारे के कोई रिश्तेदार भी यहां नहीं हैं, तो वो मुझसे रहने के लिए कोई ठिकाने लिए पूछ रहा था.
मैं- लेकिन मुझे ये ठीक नहीं लग रहा है, किसी गैर मज़हबी का हमारे साथ रहना, मेरा मतलब है कि क्या वो सैट हो पाएगा?

शहजाद- अरे कोई नहीं, वैसे भी पंजाबी लोगों की लाइफ स्टाइल बिल्कुल हमारे जैसी ही होती है. वो नॉनवेज माँस मच्छी सब खाते हैं, तो बोलो क्या कहती हो? उसे कल बुला लूँ?
मैंने मन मार कर हां में सर हिला दिया, पर मन में कुछ घबराहट सी महसूस हो रही थी.

दूसरे दिन सुबह शहजाद ने मुझसे ऊपर के दोनों कमरे ठीक करने को कहा और ऑफिस चले गए. शाम को जब 8 बजे वो वापस आए तो उनके साथ एक लड़का आया, जो करीब 24 साल का था. उसके साथ में कुछ कपड़े और थोड़ा सा सामान था. वो दिखने में काफी हैंडसम था.
मैंने मुस्कुराहट के साथ उनका वेलकम किया.

शहजाद- नसीम ये संजय है, जो मेरे कलीग हैं जिनके बारे में मैंने कल तुम्हें बताया था.
संजय ने हाथ जोड़कर कहा- नमस्ते भाभीजी..
उसकी आँखें मेरे पूरे बदन को घूर रही थीं.

मैंने मुस्कुराहट के साथ उसका स्वागत किया- आईए संजय भाई.
संजय- शहजाद भाई, आपका घर तो बहुत खूबसूरत है.
यह बात कहते हुए उसकी नजरें मुझ पर थीं.
शहजाद- शुक्रिया संजय, आओ तुम्हें मैं ऊपर के कमरे दिखाता हूँ.
मैं- आप लोग ऊपर जाइए मैं चाय वगैरह लेकर आती हूँ.

वो दोनों ऊपर गए और मैं कुछ देर में चाय लेकर पहुँची. ऊपर के फ्लोर पे 2 कमरे हैं, जिसमें से एक कमरे की बाल्कनी हमारे बरामदे में पड़ती है, जहां मैं सुबह कपड़े धोने सुखाने का काम करती हूँ.

मैंने चाय दी और कहा- और कहिए संजय भाई कौन सा कमरा सिलेक्ट किया आपने?
संजय- भाभीजी ये बाल्कनी वाला कमरा ही ठीक रहेगा.
शहजाद- नसीम, इन्हें बाल्कनी वाला कमरा पसंद है.
मैं- ठीक है, तो बस आप अपना सामान यहीं पर सैट कर लो और फटाफट नीचे आ जाओ खाना तैयार है.

संजय- अरे नहीं नहीं.. खाना वगैरह मैं अपने आप सैट कर लूँगा.
शहजाद- नहीं भाई बाहर का खाना खाने की कोई जरूरत नहीं है.
मैं- अरे संजय भाई फिक्र मत करो, मैं बहुत अच्छा खाना बनाती हूँ.
संजय- अरे नहीं नहीं भाभीजी, ऐसी कोई बात नहीं है.

मेरे और शहजाद के जोर देने पर वो राजी हो गया. उधर नीचे हॉल से बच्चों की आवाज आई जो टयूशन से आ चुके थे. बाद में खाना खाते वक़्त शहजाद ने बच्चों से संजय को मिलवाया, कुछ ही देर में संजय उनसे घुल मिल गया. रात को मैं और शहजाद बेडरूम में बातें कर रहे थे.

शहजाद- नसीम तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं होगी ना संजय के यहां रहने से?
मैं- नहीं ऐसा कुछ नहीं है, वो तो बस एक गैर मज़हबी लड़के को साथ रखना कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए आपसे कहा था, पर अभी ठीक है.. अच्छा लड़का है, सैट हो जाएगा.
शहजाद- हां सही कह रही हो.. और देखो ना एक ही दिन में बच्चों से भी कितना घुल-मिल गया है.
मैं- हां बच्चे भी संजय के साथ बहुत इन्जॉय कर रहे थे.

इसी तरह दिन बीतते गए और एक महीने में तो संजय हमारी फैमिली में काफी एडजस्ट हो गया.. ज्यादातर रात के खाने पर हम सब साथ ही होते. वो बच्चों के साथ हंसी मजाक करता था, जिसमें कभी कभी मैं भी शामिल हो जाती थी. जिससे कई बार मेरा हाथ संजय के हाथ से टच हो जाता या कई बार वो जानबूझ कर मेरे हाथ से अपने हाथ को टच कर देता था.

इस बीच मैंने नोटिस किया कि संजय मुझे कुछ अजीब ही नजरों से देखता रहता था.. खासकर जब शहजाद कुछ काम में लगे हों या मेरी नजर उस पर ना हो. तब फिर जब हमारी नजरें मिलतीं, तो वो नजर हटा लेता था. मुझे बड़ा अजीब लगता था, पर मैं हमेशा इग्नोर कर देती थी. कभी कभी वो मेरे खाने की और मेरी खूबसूरती की तारीफ़ कर देता, खासकर जब मैं ब्लैक सूट पहनती.

संजय ने बताया कि वो काफी अच्छा पेन्टर भी है, उसने अपनी ड्राइंग की हुई कुछ तस्वीरें भी हमें दिखाईं, जो वाकयी बेहद खूबसूरत थीं. मुझे भी बचपन से ही पेंटिंग का शौक था तो मैं उसके इस हुनर से बहुत ही इम्प्रेस हुई.

एक दिन सुबह जब मैं बरामदे में कपड़े धो रही थी, तो मुझे महसूस हुआ कि कोई ऊपर के कमरे की बाल्कनी में है, जो संजय के कमरे की थी. उस वक़्त में सिर्फ कुर्ती और सलवार में थी, दुपट्टा नहीं लिया हुआ था और मेरे कपड़े काफी भीगे हुए थे तो मैंने फ़ौरन खड़े होकर दुपट्टा डाल लिया और बाल्कनी में देखा तो कोई नहीं था. शायद तब तक संजय चला गया था.

आज मुझे थोड़ा गुस्सा आया, पर फिर सोचा शायद कुछ काम से आया होगा. धीरे धीरे वो रोजाना मुझे बाल्कनी से चुपके चुपके देखता. अब तक मैं इतना जान चुकी थी कि संजय की नियत मुझ पर ठीक नहीं थी.

एक दिन रात को मैं और शहजाद ऊपर संजय के कमरे में कुछ काम से गए और वापस आते वक्त मैं अपना मोबाइल उसके कमरे में ही भूल आई, जिसका पता मुझे देर रात बेडरूम में सोते वक्त चला.

मैं- शहजाद मेरा फोन नहीं दिख रहा?
शहजाद- यहीं कहीं होगा रिंग मार के देख लो.. कहीं ऊपर संजय के कमरे में ही तो नहीं छोड़ दिया?
मैं- हां.. हां.. शायद ऊपर ही रह गया है.
शहजाद- ठीक है जाओ लेकर आओ. मैंने देखा रात 12 बज चुके थे, मुझे इस वक्त संजय के कमरे में अकेले जाना कुछ ठीक नहीं लगा, तो मैंने कहा कि सुबह ले आऊँगी, वैसे भी रात को किसका फोन आने वाला है.

इसके बाद हम सो गए. सुबह 7 बजे रोज की तरह कपड़े धोते वक्त मैंने नोटिस किया कि संजय बाल्कनी से मुझे देख रहा है. मैंने फ़ौरन पीछे मुड़ कर देखा, पर मैं फिर लेट हो गई थी, संजय वहां नहीं था. तभी मुझे याद आया कि मेरा फोन ऊपर है, सो मैंने सोचा कि जाकर ले आती हूँ. वैसे भी शहजाद और बच्चे 8 बजे तक उठते हैं, उस वक्त मेरे कपड़े पूरे भीगे हुए थे, तो मैंने अपना दुपट्टा ओढ़ा और ऊपर गई. मैंने देखा संजय के कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था. मैंने नॉक किया, पर कुछ जवाब नहीं आया. पर बाथरूम से पानी की आवाज़ आई तो मैं समझ गई कि वो बाथरूम में है. मैं अन्दर चली गई, सोचा अपना फोन लेकर चली जाती हूँ.

मैंने इधर उधर नजर घुमाई तो फोन टेबल पर पड़ा दिखा, साथ में एक पेंटिंग भी थी. मैंने जब वो देखी तो मेरे होश उड़ गए और शॉक के मारे मेरी आंखें बड़ी हो गईं. वो मेरी पेंटिंग थी, जिसमें मैं बिना दुपट्टे के सिर्फ़ ब्लैक सूट और सलवार में थी, मेरे बाल खुले हुए और मेरे पूरे शरीर को बखूबी पेंट किया हुआ था, बहुत ही खूबसूरत पेंटिंग थी वो, मैं उसे देखने में खो गई थी कि तभी पीछे से संजय की आवाज़ आई- कैसी लगी भाभी जी पेंटिंग?

मैं चौंक गई और पीछे मुड़ते हुए बोली- अच्छी है पर क्यों ऐसी? मेरा मतलब बिना दुपट्टे के.. अगर शहजाद ने देख ली तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा..
संजय- और आपको?
मैंने शर्म से नजरें झुका लीं.
संजय- कहिये ना भाभीजी आपको कैसी लगी?
मैंने शर्माते हुए कहा- बहुत अच्छी..

संजय थोड़ा मेरे करीब आया और हमारी नजरें मिलीं. मैंने उससे थोड़ा गुस्से से कहा- ओह तो तुम ये पेंटिंग बनाने के लिए रोज मुझे बाल्कनी से छुप छुप के देखते हो..
संजय- हां.. भाभीजी आप हो ही इतनी खूबसूरत कि मैं आपको देखने के लिए मजबूर हो जाता हूँ और ना चाहते हुए भी मैंने ये पेंटिंग बना दी..

मुझे ना जाने आज क्या हो गया था कि में संजय की बातों को सुनते जा रही थी. संजय की बातों में इतनी कशिश थी कि मैं उसकी आंखों में आंखें डालकर उसे ध्यान से सुन रही थी.

संजय- भाभाजी आपसे एक बात कहूँ?
मेरी आँखें उसे हर सवाल का हां में जवाब दे रही थीं.
संजय- मैं आपको एक बार इस पेंटिंग की तरह देखना चाहता हूं.
मैं बहुत ही डर गई, मैंने फ़ौरन मना कर दिया.
संजय ने मेरे करीब आते हुए कहा- प्लीज़ भाभीजी मैं देखना चाहता हूँ कि मैंने ये पेंटिंग ठीक बनाई है कि नहीं..

वो बड़ी शिद्दत से मेरे पूरे बदन को निहार रहा था. मैं उसकी बात का और उसका मतलब दोनों बखूबी समझ रही थी. मैं उसे मना करना चाहती थी, पर उससे पहले ही संजय ने मेरे बिल्कुल करीब आकर धीरे धीरे करके मुझसे लिपटे हुए मेरे दुपट्टे को खींच लिया. मैं आज पहली बार किसी गैरमर्द के सामने इस तरह बिना दुपट्टे के खड़ी थी. संजय की नजरों में मुझे हवस साफ नजर आ रही थी. हम एक दूसरे को बिना पलक झपकाए देख रहे थे. मेरे पूरे शरीर में अजीब सी सरसराहट हो रही थी, मेरी धड़कनें बढ़ रही थीं, घबराहट के मारे मेरा गला सूख रहा था और होंठ कांप रहे थे.

संजय मेरे इतने करीब आ चुका था कि हम दोनों की सांसों की गरमाहट एक दूसरे में समा रही थी. मैंने शर्मा कर अपनी नजरें झुका लीं. संजय ने अपने दोनों हाथों को मेरे बालों में डालते हुए मेरे कांपते हुए होंठों पे अपने होंठ रख दिए और चूसना शुरू कर दिया.

उसकी इस हरकत से मैं हक्की बक्की थी, मैं उसे रोकना चाहती थी.. पर उसने मुझे कसकर अपनी बांहों में भर लिया. कुछ ही पल में मेरा विरोध कम हो गया और धीरे धीरे मैं भी पूरा साथ देने लगी. हम एक दूसरे के होंठों को चूसे जा रहे थे. मैंने दोनों हाथों से संजय की पीठ को सहलाते हुए उससे चिपक गई. मेरे चूचे संजय के सीने में समा गए. वो अपनी जीभ को मेरे मुँह में डालते हुए मुझे डीप स्मूच कर रहा था. मैं भी अपनी जीभ को संजय के मुँह में डालकर डीप स्मूच का पूरा आनन्द ले रही थी. उसका एक हाथ मेरी पीठ को सहला रहा था और दूसरा हाथ मेरे चूतड़ों को दबा कर मुझे उसके लंड की तरफ खींच रहा था.

करीब दो मिनट के लिप स्मूच के बाद संजय के होंठ मेरे गालों को चूमते हुए मेरी गरदन पे जा पहुँचे. संजय मेरी गरदन को दोनों तरफ से बेतहाशा चाट रहा था, जिससे संजय की लार से मेरी गरदन पूरी गीली और लाल हो चुकी थी. मेरे मुँह से मदहोशी भरी सिसकारियां निकल रही थीं. संजय मेरे होंठ गाल कान और गरदन पर चुम्बनों की बौछार कर रहा था. मैं भी अब इतनी मदहोश हो चुकी थी कि पूरा जोर लगा कर उसको अपने अन्दर खींच रही थी.

करीब पांच मिनट तक यही चलता रहा, फिर संजय ने मुझे घुमा कर दीवार से चिपका दिया और पीछे से मुझे अपनी बांहों में भर कर मेरे चूचों को दबाते हुए फिर से मेरी गरदन को चूमना शुरू कर दिया. मेरे मुँह से मादक सिसकारी निकल गई, पता नहीं क्यों, आज मेरा शरीर मेरा साथ नहीं दे रहा था और संजय की हर हरकत का मजा लेना चाहता था. मेरी सांसें तेज चल रही थीं. मेरे दोनों चूचे संजय के हाथों में खेल रहे थे और उसके गीले होंठ मेरी मखमली गरदन को मसाज दे रहे थे.

संजय का लंड मेरे चूतड़ों के बीच जगह बना रहा था. मैं विरोध तो नहीं कर रही थी, पर मेरे मुँह से ‘नहीं संजय.. नहीं प्लीज.. ये गलत है.. मैं शादीशुदा हूँ.. ये गलत है..’ जैसे शब्द निकल रहे थे.

संजय का एक हाथ मेरे पेट को सहलाते हुए मेरी सलवार तक पहुंचा. मैं कुछ समझती उससे पहले तो मेरा नाड़ा खिंच चुका था और मेरी सलवार जमीन पर थी.
मैंने संजय की तरफ देखकर मना करना चाहा, पर मैं कुछ कहती उससे पहले संजय ने मेरे होंठों को अपने होंठों में भर के लिपलॉक कर लिया और अपनी उंगलियों से मेरी पेन्टी के ऊपर से सहलाने लगा. फिर उसने मेरी पेन्टी में हाथ डाल कर मेरी चुत पे अपनी कामुक होती उंगली फेर दी और धीरे धीरे संजय ने एक उंगली मेरी रस से तरबतर होती गीली चुत में डाल दी.

मैं एकदम से उछल पड़ी और संजय के बालों में हाथ डाल कर उसके होंठों को जोर से काटने लगी. संजय मेरे होंठ गाल कान और गरदन पर बेतहाशा चूम रहा था और अपनी दो उंगलियों को मेरी रसभरी गीली चुत में अन्दर बाहर कर रहा था.
मैं कामुकता से सराबोर सिसकारियां ले रही थी ‘सिस्स्स्सस अम्म्म्मम..’ मेरा पूरा तन और मन अब वासना की आग में डूब चुका था और मैं अपनी सारी मर्यादा भूल चुकी थी, मैं भूल चुकी थी कि मैं शादीशुदा हूँ और अपने शौहर से बहुत प्यार करती हूँ, मैं दो बच्चों की अम्मी हूँ, किसी के घर की इज्ज़त हूँ.
ये सब कुछ भूलकर मैं अब एक ऐसे गैर मर्द की कामुक उंगली से अपनी चूत के मर्दन का भरपूर आनन्द ले रही थी.. जो उम्र में मुझसे करीब 10 साल छोटा था.

संजय ने मेरी चूत में अपनी उंगली की स्पीड बढ़ा दी.
‘आह्ह्ह्ह्ह अम्म्म्म्मम..’ मैं बहुत ही उत्तेजित हो गई और किसी भी वक्त झड़ने वाली थी. करीब 3-4 मिनट के फिंगर सेक्स के बाद मेरी चुत से ढेर सारा रस निकल पड़ा और मेरी जांघों पर बहने लगा, मेरा शरीर अब निढाल हो गया था. जबकि संजय अभी भी मेरे कोमल होंठों का रस पी रहा था.

मुझसे रहा नहीं गया और मैं संजय की तरफ घूम गई और संजय के होंठों को जोर जोर से चूसने लगी. मेरी इस हरकत से वो भी पूरे जोश में आ गया. हम एक दूसरे को बेतहाशा चूमने लगे. मैं मदभरी सिस्कारियां लेती हुई अपना चेहरा इधर उधर घुमा रही थी और संजय मेरी गरदन को अपनी लार से भिगोता हुआ लगातार चूम रहा था.

फिर संजय ने मेरे कुरते को मेरे कन्धों तक ऊपर कर दिया, जिससे मेरे चूचे बाहर आ गए. संजय ने दोनों हाथों से मेरे चूचों को मसलना शुरू कर दिया और अपनी गरम जीभ मेरे निप्पल पे रख दी.
‘सिस्स्स.. आहम्म्म्म.. धीरेरेरे.. प्लीज़..’ करते हुए मैं उसके बालों में उंगलियां फिरा रही थी. मेरे दोनों चूचे चूस चूस और निप्पलों को काटकर संजय ने पूरे लाल कर दिए थे.

करीब 5 मिनट की चूची चुसाई के बाद उसने धीरे से नीचे मेरी नाभि के अन्दर जीभ डालते हुए दोनों हाथों से मेरी पेन्टी उतार दी, जिसमें अब मेरी क्लीन शेव मखमली चूत बिल्कुल नंगी एक गैर मर्द के सामने थी.
संजय नीचे बैठ गया, उसने पहले मेरी चूत के आस पास हल्के से चुम्बन किए. इससे मैं और गरम हो गई और मैंने अपने पैर थोड़े फैला दिए. संजय ने अपनी गरम जीभ मेरी चुत पे रख दी.

‘आहहह..’ मेरे मुँह से चीख निकल गई. ये मेरे लिए पहला और बिल्कुल नया अनुभव था. मेरे शौहर शहजाद ने भी अब तक कभी मेरी चुत नहीं चाटी थी. मैं तो जैसे सातवें आसमान पर थी, इतना मजा आ रहा था कि मैं शब्दों में बता नहीं सकती.
संजय मेरी चुत को पूरी लम्बाई में चाट रहा था. वो के निचले हिस्से से अपनी जीभ को रगड़ता हुआ मेरी चूत के दाने तक जीभ को फेर रहा था. उसकी खुरदुरी जीभ जैसे ही मेरे दाने पर लगती, मेरी आह निकल जाती थी. एक अजीब सी सनसनी भर रही थी.

मैं अपने दोनों हाथ संजय के सर में डालकर अपनी चुत में जोर से दबा रही थी. हम दोनों इतने मदहोश हो चुके थे कि रिश्ते, नाते, शर्म, हया.. सब कुछ भूल कर उस पल का आनन्द ले रहे थे. मुझसे रहा नहीं जा रहा था.
अब तो संजय अपनी पूरी जीभ मेरी चूत में अन्दर बाहर कर रहा था. मैं अपने दोनों हाथों से उसके सर को अपनी चुत में दबाते हुए जीभ चुदाई का पूरा आनन्द ले रही थी ‘आह मम्म्म्म सीस्स्स्स उइइइइ..’

मैं अब झड़ने वाली थी तो मैंने अपने हाथों से जोर से संजय का सर अपनी चुत में दबा दिया, जिससे संजय की जीभ मेरी चुत में अन्दर तक धंस गई. संजय ने भी पोजीशन को समझते हुए चुत के अन्दर ही जीभ को लपलपाना शुरू कर दिया, जिससे मेरी चूत का मजा दुगना हो गया.
इतना मजा तो कभी नहीं आया था मुझे सेक्स में!
‘आआह ईईई आआआआह आआआह..’ और आखिरकार मेरी चुत ने ढेर सारा रज संजय के मुँह पर ही छोड़ दिया. मेरा शरीर बिल्कुल निढाल हो चुका था. मैंने संजय को उठा कर अपनी बांहों में ले लिया और हम दोनों ने एक दूसरे के होंठ चूसना शुरू कर दिया.

तभी बाहर से मेरी बेटी गुड्डी की आवाज़ आई- अम्मी… अम्मी.. कहां हो?
मैंने हडबड़ा कर एकदम संजय को अपने से दूर कर दिया और कपड़े पहनते हुए कहा- आई… बेटा..


अब मैं फ़ौरन नीचे भाग आई. इस वक्त मैं बहुत घबराई हुई थी. मैंने देखा घड़ी में 8 बज गए थे. शहजाद और बच्चे उठ चुके थे.
शहजाद- कहां गई थी?
मैंने डर के मारे अपनी नजरें झुकाते हुए कहा- ऊपर मेरा फोन लेने गई थी, आप जल्दी से तैयार हो जाइए, मैं चाय नाश्ता बना कर लाती हूँ.

ये कहती हुई मैं झट से किचन में चली गई. मैं किचन में जो कुछ मेरे साथ हुआ, वह सोच कर मन ही मन अपने आपको कोस रही थी कि ये मैंने क्या कर दिया. जान से ज्यादा प्यार करने वाले शौहर को धोखा दे दिया. मेरी आँखों से पछतावे के आंसू निकलने लगे.

इसी कशमकश में बहुत देर हो रही थी. मैं अपने आप को शान्त करके नाश्ता बनाने लगी, तब तक संजय भी नीचे आ चुका था और हॉल में मेरी बेटी के साथ खेल रहा था.

तभी शहजाद ने आवाज लगाई- अरे नसीम और कितनी देर लगेगी. ऑफिस का टाइम हो रहा है, लेट हो जाउंगा.
मैं- अभी लाई बस 5 मिनट..
तभी संजय बोला- अरे शहजाद भाई बेचारी भाभी अकेले कितना मैनेज करेंगी, चलो मैं जाकर उनकी कुछ हेल्प कर देता हूँ.

ये कहकर संजय किचन में आ गया. हमारा किचन कुछ इस तरह था कि हॉल से किचन में कुछ नहीं देख सकते थे. मेरे पीछे संजय के आने की आहट हुई, मैं पीछे मुड़ कर देखती, इससे पहले ही संजय ने पीछे से मुझे अपनी बांहों में भर लिया और मेरी गरदन को चूमने लगा. उसका तना हुआ लंड मुझे अपनी गांड के छेद में गड़ता सा महसूस हो रहा था.

मैं घबरा कर बोली- ये क्या कर रहे हो?
संजय ने मुझे अपनी बांहों में कस के भरते हुए और गरदन को चूमते हुए कहा- नसीम मेरी जान.. अब मुझे कब शांत करोगी.. हम हमारे अधूरे काम को कब पूरा करेंगे?

ये पहली बार था जब संजय ने मुझे नाम से पुकारा था. संजय मुझे लगातार किस कर रहा था और मैं अपने आपको उससे छुड़ाने की नाकाम कोशिश कर रही थी. संजय की मजबूत पकड़ से निकलना मुश्किल था. मैंने संजय की तरफ देखकर मना करना चाहा, पर मैं कुछ कहती उससे पहले उसने मेरे होंठों को अपने होंठों में भर के लिपलॉक कर लिया और चूसने लगा. वो दोनों हाथों से मेरे चूचों को मसल रहा था. मैं भी धीरे धीरे बहकने लगी थी, पर जैसे तैसे मैंने अपने आप पर क्नट्रोल करते हुए सख्ती से संजय को अलग कर लिया.

मैं- प्लीज़ संजय.. ये गलत हे हम ये सब नहीं कर सकते.. मैं किसी की बीवी हूँ, तुम मुझसे बहुत छोटे हो, मैं तुम्हें संजय भाई कहकर बुलाती हूँ.

पर संजय पर तो जैसे सेक्स का भूत सवार था. मैं ज्यादा कुछ बोलती, उससे पहले तो संजय ने मेरा हाथ खींच कर मुझे अपनी बांहों में भर लिया. वो मेरे होंठों को चूसने लगा और मेरी गरदन को पूरी लेन्थ में चाटने लगा.

संजय, एक औरत को कैसे शिड्यूस करना है, वो अच्छी तरह जानता था. कुछ ही पलों में मेरा विरोध सिस्कारियों में बदल गया और हम एक दूसरे को बेतहाशा चूमने लगे.

करीब 2 मिनट के किसिंग के बाद मैंने कहा- बस बस, कोई आ जाएगा, छोड़ो मुझे प्लीज़..
संजय- एक शर्त पर…
मैं- क्या?
संजय- बच्चों के स्कूल जाने के बाद तुम मेरा फेवरेट ड्रेस पहन कर ऊपर मेरे कमरे में आओगी.
मैं- क्यों? आज तुम ऑफिस नहीं जाओगे?
संजय- नहीं.. कुछ बहाना बना के मैं छुट्टी ले लेता हूँ.. तुम आओगी ना?
मैंने थोड़ा गुस्से से कहा- नहीं.. मैं नहीं आऊँगी!

मैं अब भी संजय की बांहों में थी. मैं उसे मना कर रही थी, पर मेरी आंखें उसे साफ साफ हां में जवाब दे रही थीं.

संजय ने मुझे हल्की सी लिप-किस करते हुए कहा- मुझे पता है, तुम जरूर आओगी.. वो भी मेरा फेवरेट ड्रेस पहन कर..
मैं- तुम्हारा फेवरेट.. कौन सा?
संजय- वही ब्लैक ड्रेस, जिसमें मैंने तुम्हारी पेंटिंग बनाई है.
मैं- नहीं.. मैं नहीं आऊँगी..

संजय ने मुझे फिर लिप-किस किया कुछ पल के लिए मैं भी उसमें समा गई.
संजय- मैं इंतजार कर रहा हूँ.
यह कहकर संजय किचन से बाहर चला गया. फिर मैं नाश्ता लेकर गई, तब तक संजय शहजाद से कुछ बात कर रहा था.

मेरे जाते ही शहजाद ने कहा- नसीम, आज संजय की तबीयत ठीक नहीं है, तो वो ऑफिस नहीं आ रहा.
मैंने थोड़ा नाटक करते हुए कहा- क्यों क्या हुआ?
शहजाद- क्या पता.. कह रहा है पेट में कुछ दर्द सा है और बुखार जैसा लग रहा है, तो मैंने भी उसे छुट्टी के लिए कह दी और कहा है कि दवाई ले लेना. मैं ऑफिस में बात कर लूँगा..

संजय मेरे सामने देखते हुए नॉटी सी स्माइल कर रहा था. फिर सबने नाश्ता किया और शहजाद ऑफिस के लिए निकल गए. मैं किचन में काम कर रही थी. कुछ देर बाद बच्चे भी स्कूल चले गए. मैं नहा कर रेडी हो रही थी, पर मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था. मैं मन ही मन सोच रही थी कि क्या करूँ? ऊपर जाऊं कि नहीं? एक तरफ मेरी मर्यादा मुझे रोक रही थी, पर मेरा दिल और जिस्म संजय की तरफ खिंचा जा रहा था.

आखिरकार मैंने अलमारी से संजय का फेवरेट ब्लैक ड्रेस निकाल कर पहन लिया. आज एक पतिव्रता बीवी, जिसने कभी किसी गैर मर्द की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखा, वो आज गैर मर्द को अपना सब कुछ सौंपने जा रही थी.

मैंने हल्का सा मेकअप किया और ऊपर संजय के कमरे की तरफ चली गई. कमरे का डोर खुला था तो मैं अन्दर चली गई. संजय मेरी पेंटिंग को देख रहा था.
मेरी तरफ देखकर उसने कहा- मैंने कहा था ना कि तुम जरूर आओगी.
मैं बस शर्म के मारे नजरें झुकाए खड़ी थी. संजय मेरे करीब आया तो मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

संजय ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींच कर अपनी बांहों में भर लिया. हम दोनों एक दूसरे में सिमट रहे थे.

करीब 2 मिनट के बाद संजय ने मेरे होंठों से होंठ मिलाए और हमने फुल स्लीव किस की. संजय मेरी गरदन को जैसे खाए जा रहा था. मैं भी मस्ती के साथ उसका साथ दे रही थी. संजय ने किस करते हुए ही मेरे कपड़े निकाल दिए. मैं अब सिर्फ ब्रा और पेन्टी में थी.

संजय- मेरी जान, इसे तो अब अपने हाथों से उतार दो.
मैं- क्यों? सब कुछ तो तुमने उतार दिया है?
संजय- हां, पर मैं तुम्हें ऐसे देखना चाहता हूँ.

मैं कामुकता में इतनी मदहोश हो चुकी थी कि संजय की हर बात को माने जा रही थी. मैंने धीरे धीरे अपनी ब्रा पेन्टी को निकाल दिया. अब मैं एक गैर मर्द के सामने पूरी नंगी खड़ी थी. संजय लगातार मेरे पूरे बदन को घूरे जा रहा था. मेरी हालत खराब थी, मेरा हलक सूख रहा था.

संजय की आँख के एक इशारे पर मैं दौड़ती हुई जाकर उसकी बांहों में समा गई. संजय मेरे पूरे बदन को चूम रहा था, मुझ पर वासना इतनी हावी हो चुकी थी कि मैंने संजय के शर्ट के सारे बटन तोड़ दिए और उसकी शर्ट उतार फेंकी. संजय ने अपनी पेन्ट और निक्कर भी उतार दिए. उसका तना हुआ लंड मेरी नाभि के नीचे टच हो रहा था. उसके लंड की लम्बाई तो शहजाद के लंड जैसी ही थी, पर वो शहजाद के लंड से काफी मोटा था. संजय ने मुझे अपनी गोद में उठा कर बेड पर डाल दिया और मेरे ऊपर आ गया.

मैं उसकी प्यार और हवस भरी आंखों में देखकर शर्म से मरी जा रही थी क्योंकि मैं बिस्तर पर संजय के साथ नंगी पड़ी थी. संजय मेरे होंठ गाल गरदन कान हर जगह चुम्बनों की बौछार कर रहा था- नसीम मेरी जान.. आज तो मैं तुम्हें खा जाउंगा.. जब से तुम्हें देखा है, मैं तुम्हारे नाम की मुठ मार रहा हूँ.
मैं उससे लिपटती हुई बोली- ओह्हह.. संजय खा जाओ मुझे आहह.. आहहहह मैं अब तुम्हारी हूँ.. जैसे चाहो, जो चाहो.. वो करो.. आहह आह.. आहह..

संजय मुझे पागलों की तरह चूमे जा रहा था. मैं भी पूरा साथ दे रही थी. संजय ने मेरे एक चूचे के निप्पल को मुँह में लेकर चूसना काटना शुरू किया.

‘आहहहह.. आह्ह्ह्हे.. इह्ह्ह्.. सिस्स्स्स..’ मैं भी उसका साथ देती हुई चूची चुसाई का मजा ले रही थी. संजय अपनी उंगलियों से मेरी चुत को सहला रहा था. मैं अपने हाथ को उसके सर में डालकर चुत की तरफ खींचे जा रही थी.

फिर संजय नीचे मेरी चुत की तरफ चला गया और एक हल्की किस के साथ फुल लेन्थ में मेरी चुत को चाटना शुरू कर दिया.
‘ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह्ह मम्म्म..’
संजय ने मेरी चुत चाटते हुए कहा- ओह नसीम.. क्या चिकनी ओर मखमली चुत है तुम्हारी.. अम्म्म्मं..
मैं- चाटो संजय.. आह आह और चाटो.. खा जाओ इसे.. आह आह्ह्ह्ह्हह आह
संजय- शहजाद भाई नहीं चाटते?
मैं- नहीं.. उन्हें ये सब अच्छा नहीं लगता.

फिर संजय घूम कर मेरे ऊपर आ गया. अब हम 69 पोजीशन में थे. संजय का मोटा लंड मेरे होंठों को टच हो रहा था. मैं उसे अपनी हथेली में लेकर सहला रही थी
संजय- नसीम चूसो इसे..
मैंने कभी ऐसा नहीं किया था तो मैंने मना कर दिया, पर संजय मेरी चुत को इस तरह चाट रहा था कि मैं अपने आप पर कन्ट्रोल नहीं कर पाई और मैंने संजय के मोटे लंड को सहलाते हुए मुँह में ले लिया, जिसकी एक्साइटमेन्ट से संजय ने अपनी जीभ मेरी चुत में अन्दर तक डाल दी.

‘उम्म्म आहहह उम्म्ह… अहह… हय… याह… इह्ह्ह..’ मेरी आंखें बड़ी हो गईं. अब मैं संजय का पूरा लंड अपने मुँह में लेकर चूस रही थी. संजय भी अपनी जीभ को मेरी चुत में अन्दर तक डाल रहा था.

करीब पन्द्रह मिनट तक हम एक दूसरे को ऐसे ही मजा देते रहे. फिर संजय उठा और मेरे ऊपर चढ़ गया और मेरे होंठों को मुँह में लेकर कस के चूसने लगा. उसका तना हुआ लंड मेरी जांघों पर टहल रहा था. मैं उसके लंड को अपनी चुत में लेने के लिए तड़प रही थी. आज पहली बार मेरे शौहर के अलावा किसी और का लंड मेरी चुत की सैर करने जा रहा था. वो भी एक गैर मज़हबी जवान लड़के का लंड.

मैंने दोनों पैर फैलाकर संजय के लंड का स्वागत किया. संजय अपने मूसल लंड को मेरी चुत पे रख कर रगड़ने लगा. उसका मोटा सुपारा मेरी चूत की गीली फांकों में सरक रहा था.
मैं- ओह संजय अब मत तड़पाओ प्लीज़..
वैसे भी मेरी चुत काफी गीली हो चुकी थी तो संजय के लिए रास्ता काफी आसान था. संजय ने एक ही झटके में अपना 7 इंच लंबा और मोटा लंड मेरी चुत में डाल दिया.
‘ओहह.. आह्ह्ह्ह्ह्.. आहहहह.. मरी..’

मेरे मुँह से जोर से चीख निकल पड़ी. मुझे बहुत दर्द हुआ, शहजाद से 12 साल से सेक्स करने के बावजूद मेरी सील आज ही टूटी हो, मुझे ऐसा महसूस हो रहा था. सच में संजय का लंड बहुत ही मोटा था. मेरी हालत देखकर संजय कुछ पल के लिए रुक गया और मुझे लिपकिस करने लगा.

कुछ देर बाद मेरे ठीक होने पर संजय ने अपना लंड धीरे धीरे अन्दर बाहर करना शुरू किया. कुछ ही देर में मेरा दर्द मजा में बदल गया और मैं फुल मस्ती में आ गई. अब मैं अपनी कमर उठा उठा कर संजय के हर धक्के को अपने अन्दर तक ले रही थी.. जिससे संजय का मजा दुगना हो रहा था. संजय का लंड मेरी बच्चेदानी तक महसूस हो रहा था. मेरी ऐसी चुदाई पहले कभी नहीं हुई. पूरा कमरा ‘पच पच.. और आहहहह.. आह्ह्ह्हे..’ की आवाज़ से गूँज रहा था.

तभी अचानक मेरे फोन की रिंग बजी, जो पलंग पर मेरे पास ही पड़ा था. मैंने फोन में देखा तो वो शहजाद का कॉल था. मेरे तो जैसे होश ही उड़ गए. मेरे हाथ पैर कांपने लगे, मैं डर गई थी कि शहजाद को कुछ पता तो नहीं चल गया. संजय ने मेरी चुत से अपनी नजर ऊपर उठाई तो मैंने फोन की स्क्रीन उसकी तरफ घुमा दी. उसने इशारे से मुझे फोन उठाने को कहा, मैंने कांपते डरते हुए फोन उठाया.

मैं- हल्ल्ल्ल् ल्ल्ल्लो..
शहजाद- हल्लो नसीम!
मैं धीमी और कांपती आवाज में बोली- हां शहजाद कहिए?
शहजाद- क्या हुआ संजय खाना खाने के लिए नीचे उतरा या नहीं?

मैंने सुकून की सांस ली कि शहजाद को कुछ पता नहीं चला था. उन्होंने तो बस ऐसे ही संजय की तबीयत पूछने के लिए फोन किया था.
मैं- नहीं, अभी तक उतरा नहीं है.
शहजाद- ओह.. लगता है उसकी तबीयत ठीक नहीं हुई है, तुम जरा जाकर देख तो लो.. ऐसा करो उसका खाना ऊपर ही ले जाओ और उसे दवाई भी दे देना.
मैं- हां ठीक है.

अब मैं उन्हें क्या बताती कि उनका संजय जिसकी वो इतनी फिक्र कर रहे हैं, वो बिस्तर पे उन्हीं की खूबसूरत बीवी की नंगी चुत में अपना मोटा लंड डाले पड़ा है और उनकी पतिव्रता बीवी, जिससे वो बहुत प्यार और भरोसा करते हैं, वो अपनी नंगी चुत का उसको हकदार बनाए उसके मोटे लंड से चुद रही है.

मेरे चेहरे की राहत देख कर संजय भी समझ गया कि कोई दिक्कत नहीं है और खुश होते हुए उसने मेरी चुत को जोरों से चोदना शुरू कर दिया. मैं अपने आप पर जैसे तैसे काबू रखते हुए शहजाद से फोन पर बात कर रही थी और इधर संजय मेरी चुत में अन्दर तक लंड पेल रहा था.

मैंने अपने मुँह को हवा से फुला लिया और हाथ से मुँह जोर से दबा दिया ताकि मेरी चीख ना निकल जाए.
उधर फोन पर शहजाद- नसीम, तुम अपने हिसाब से देख लो और संजय का ख्याल रखना.

मेरा एक हाथ फोन पे और एक हाथ संजय की पीठ में था. संजय अपने लंड को जोरदार झटके देते हुए मेरी चुत में डाल रहा था. मुझसे रहा नहीं जा रहा था- हां ठीक है, मैं यहां सब देख लूँगी.
यह कह कर मैंने फोन काट दिया, उधर संजय मेरी चुत में अन्दर तक लंड डालकर भरपूर चुदाई कर रहा था.

बड़ा अजीब मंजर था वो.. एक पतिव्रता बीवी और दो बच्चों की माँ अपने शौहर से बेवफाई करके उसी के घर में एक गैर मर्द, जो गैर मज़हबी भी था, उसके साथ चुदाई करवा रही थी. इधर संजय भी अपने से दस साल बड़ी और थोड़ी मोटी औरत को जोरों से चोद रहा था.

शहजाद कभी भी साथ आठ मिनट से ज्यादा नहीं टिक पाते थे, पर संजय पूरे बीस मिनट से मेरी चुत को चोद रहा था.. या यूं कहूँ कि मेरी चुत फाड़ रहा था. मेरी चुत इतनी देर में दो बार झड़ चुकी थी, पर संजय रुकने का नाम नहीं ले रहा था. पूरा कमरा मेरी ‘आह्ह्ह आह्ह्ह..’ की चीखों और ‘पच पच पच..’ की आवाज से भर गया था. असली चुदाई क्या होती है, ये आज मुझे समझ आया था.

संजय ने अपने धक्के और तेज कर दिए, जिससे मैं समझ गई कि वो भी अब झड़ने वाला है. मैंने उसको कसके अपनी बांहों में समेट लिया.
संजय ने मेरे होंठों को चूसते और काटते हुए चार छह धक्कों के बाद अपने गरम लावा से मेरी चुत को भर दिया. हम दोनों कुछ देर तक लिपकिस करते रहे. फिर धीरे से संजय ने अपना लंड मेरी चुत से बाहर निकाल लिया.
ओहहह…

संजय- मजा आया नसीम मेरी जान?
मैंने शरमाते हुए अपनी नजरें झुका लीं.
संजय- नहीं ऐसे नहीं.. सही सही बताओ मजा आया कि नहीं?

वह भी जानता था कि मुझे कितना मजा आया था, पर वह मेरे मुँह से बुलवाना चाहता था. मैंने उससे नजरें मिलाते हुए एक हल्की सी लिपकिस की.
मैं- बहुत मजा आया.. संजय तुमने मुझे सच में आज औरत बना दिया. आज से मैं हमेशा के लिए तुम्हारी हो गई.

यह कहते हुए हमने फिर लिपलॉक कर लिए. संजय ने मेरे हाथ को लेकर अपने लंड पर रख दिया. मैं लंड को सहलाने लगी. कुछ ही देर में संजय का लंड मुझे चोदने के लिए तैयार हो गया.

इस बार उसने मुझे अपने ऊपर लेकर चोदा और शाम चार बजे तक संजय ने मुझे 3 बार बेड पर चोदा. फिर बाथरूम में नहाते वक्त भी संजय ने मुझे घोड़ी बना कर चोदा. संजय में गजब का स्टेमिना था. उसने मेरी तो हालत खराब करके रख दी थी. हर बार आधे घंटे तक मेरी जोरों की चुदाई की.

फिर मैं शाम तक नीचे आ गई क्योंकि बच्चों के स्कूल से आने का वक्त हो गया था. दर्द के मारे मुझसे चला नहीं जा रहा था. संजय मेरी हालत को देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था.

बस फिर तो क्या था.. संजय हर बार मेरी इसी तरह चुदाई करता है, ऊपर उसके रूम में.. कभी हमारे बेडरूम में.. कभी किचन में.. मतलब घर का कोई कोना ऐसा नहीं छूटा, जहां संजय ने मेरी चुदाई ना की हो. अब तो मैं भी संजय की दीवानी हो चुकी हूँ. शहजाद अब सिर्फ मेरे नाम के ही शौहर हैं, कभी कभी तो शहजाद की मौजूदगी में भी कुछ बहाना बना कर मैं संजय के कमरे में चली जाती हूँ और हम चुदाई का भरपूर आनन्द लेते हैं. छह महीने से जब भी मौका मिलता है, हम सेक्स का भरपूर मजा ले रहे हैं.
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