Wednesday, March 14, 2018

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दीदी की कामवासना और उनके गुलाम

दीदी की कामवासना और उनके गुलाम

(Didi Ki Kamvasna Aur Unke Gulam)

नमस्कार दोस्तो, मेरा नाम विक्की है और मैं एक 22 साल का युवक हूँ. मैं अपने घर से दूर इस बड़े शहर में रह कर पढ़ाई करता हूँ. मेरे साथ मेरी दीदी, जो कि 27 साल की एक मस्त माल हैं, मेरे साथ रहती हैं. मेरी दीदी पांच फीट छह इंच लम्बी, फिगर 30-32-36 मतलब लम्बी चौड़ी भरे पूरे बदन की मालकिन हैं. मेरी दीदी एक बड़ी विदेशी कंपनी में काम करती हैं और स्वभाव से बहुत जिद्दी और गुस्सैल हैं. दीदी की चल ऎसी है जैसे कोई सेना का अफसर चल रहा हो!

पिछले 3-4 महीने से दीदी अक्सर देर से घर आती थीं. मैं कॉलेज से शाम को 4 बजे तक आ जाता था और दीदी के ऑफिस का टाइम भी 5 बजे का था लेकिन अब वो 8 बजे के पहले नहीं आती थीं.

एक दिन मेरे पूछने पर उन्होंने मुझे डांटते हुए कहा- तू सिर्फ अपनी पढ़ाई पे ध्यान दे और मुझे मेरे ऑफिस का काम करने दे. अब से मैं कुछ और महीनों तक देर से आऊँगी.
इसके बाद मैंने उनसे कुछ भी पूछना छोड़ दिया और अपनी पढ़ाई में लग गया.

एक दिन मैं कॉलेज से छूटा तो सोचा कि अपने दोस्त के घर होता चलूँ. मैं अपनी बाइक स्टार्ट करके दोस्त के घर की ओर चल दिया. मैं अपने रास्ते पर ही था कि अचानक से एक कार मेरे बिल्कुल पास से आगे निकली, जिसमें मेरी दीदी आगे बैठे हुई थीं, मैंने दीदी को पहचान लिया था. कार को दीदी का बॉस दयाल ड्राइव कर रहा था और पीछे की सीट पर दीदी के ऑफिस के दो बड़े ऑफिसर राकेश और सतीश बैठे हुए थे. उस समय लगभग पांच बजे का समय था. दीदी को इस तरह ऑफिस टाइम के बाद उसके बॉस लोगों के साथ देख कर मैं सोच में पड़ गया कि ये लोग इस वक्त कहाँ जा रहे होंगे?
यही पटा लगाने के लिए और मैंने उनकी कार का पीछा करना शुरू कर दिया. कार 70 की स्पीड पर जा रही थी तो मुझे भी अपनी बाइक उसी रफ्तार से दौड़ानी पड़ी.

कार शहर के बाहर निकल गई और करीब बीस मिनट के बाद एक सुनसान फार्म हाउस के सामने आकर रुकी. कार से दीदी और बाकी तीनों लोग बाहर आ गए और फार्म हाउस के बड़े गोदाम के अन्दर चले गए.
ये सब देख कर मैं हैरान हो गया और मन में बुरे ख़याल आने लगे. मैंने अन्दर जाने का फैसला लिया और किसी तरह फार्म हाउस के पीछे की तरफ से घुसा. अब तक करीब आधा घंटा हो चुका था. मैंने किसी तरह जल्दी से पीछे के हिस्से में गोदाम के एक छोटे से दरवाजे में लगी एक छोटी सी खिड़की को खोल कर अन्दर का माहौल जानने की कोशिश की.

अन्दर का दृश्य देख कर मेरे होश उड़ गए. वो अन्दर का कमरा दूधिया रोशनी से नहाया हुआ था. जिसकी तीन तरफ की दीवारों के खूटों और रैक पर लोहे की मोटी चैनें, चमड़े के चाबुक, कोड़े, मोटे चमड़े के हंटर, घुड़सवारी के सभी सामान, एक बिना घोड़े के जुती हुई गाड़ी, मोटे रस्से, लकड़ी के विभिन्न आकार के रैक रखे हुए थे.

कमरे के बीच में दयाल, राकेश और सतीश नंगे होकर घुटनों के बल बैठे हुए थे. उन सबके हाथ पीछे पीठ पर हथकड़ी से बंधे हुए थे और उनके सामने मेरी दीदी थीं. दीदी ने बस एक पतली सी चमड़े की चड्डी पहनी हुई थी. साथ में एक ऊँची हील का चमड़े का बूट पहना था जोकि लम्बाई में उनकी जांघ तक था और दीदी का बाकि पूरा शरीर नंगा था.

दीदी के हाथ में एक चमड़े का हंटर था, जिसे दीदी उन तीनों की नंगी पीठ पर बरसाते हुए कह रही थीं- रांड की औलाद कुत्तों, तुम्हारी यही जगह है अपनी मालकिन के जूतों में.. अब जल्दी से अपनी जीभ से चाट कर मेरे जूते चमकाओ, वर्ना कोड़े मार मार के चमड़ी उधेड़ दूंगी.

इतना सुन कर वे तीनों दीदी के जूते चाटने लगे और दीदी उन तीनों की नंगी पीठ और गांड पर पूरी ताक़त से कोड़े बरसाती रहीं.
फिर दीदी ने उन तीनों को खड़ा करके उनके हाथ ऊपर रस्सी से बांध दिए और एक चाबुक से उनकी खाल उधेड़ने लगीं. वो तीनों दीदी से रहम की भीख मांग रहे थे, पर दीदी ने और क्रूरता से उन पर कोड़े बरसाए.

करीब पौने घंटे तक उनको पीटने के बाद दीदी ने उन्हें खोल दिया और अपने बूट से तीनों को लंड पर लातें मारने लगीं. उन तीनों की मूत निकल गई. ये देख कर दीदी ने उन्हें फिर सजा का हुक्म देते हुए उन तीनों को घोड़ागाड़ी में जोत दिया और खुद गाड़ी की सीट पर बैठ गईं.

दीदी ने अपनी चड्डी भी उतार दी और उसे अपने बॉस दयाल के मुँह में ठूंस दिया. अब दीदी ने उन पर हंटर चलाना शुरू किया, जिससे कि वो चलने लगी.
दीदी आराम से गाड़ी पर घूमने का मजा लेती हुईं उन पर चाबुक चला रही थीं.
बीस मिनट तक कमरे के कुछ चक्कर लगाने के बाद दीदी उतर गईं और उन तीनों को रिहा किया.

तीनों की गांड कोड़े की मार से छिल गई थी और पीठ एकदम नीली हो चुकी थी. दीदी ने फिर बारी बारी से तीनों गुलामों के मुँह में मूता. उन तीनों ने एक एक बूंद चाट कर दीदी का मूत पिया.

इसके बाद उन तीनों ने दीदी की बुर को चूम कर और जूते चाट कर थैंक्यू कहा और फिर दीदी अपने कपड़े पहनने लगीं.

ये पूरा खेल देख कर मेरी गांड फटने लगी. दीदी का ऐसा रूप देख कर मुझे अजीब लगा. मेरा लंड तन चुका था. जल्दी से मैंने लंड सही किया और भाग के वापस बाइक के पास आ गया. अब मैंने बाइक घर की ओर दौड़ा दी.

रात के 8 बजे दीदी वापस घर आईं. वो अपने ऑफिस वाली ड्रेस में थीं. उन्हें देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया और शाम का पूरा खेल मेरी आँखों के सामने से गुजर गया.
उन्होंने पूछा- तुझे क्या हुआ?
मैंने कुछ नहीं कहा और उनके लिए कॉफ़ी बनाने चला गया. मेरे सामने बस उनका नंगा बदन और गुस्से से कोड़ा मारते हुए उनकी शक्ल याद आ रही थी. मेरा मन उनका गुलाम बन कर उन्हें चोदने का होने लगा.

मैंने उस रात खाना बनाया और दीदी को देने गया. वो मेरे कमरे में बैठ कर टी.वी. देख रही थीं. मेरे खाना लाने पर वो खुश हो गईं. वो खाना खा कर मेरे कमरे में ही सो गईं और मैंने उसके कमरे को बाहर से बंद करके उनकी अलमारी देखने लगा.

मैं ये जानना चाहता था कि मेरी दीदी कैसे उन कुत्तों की मालकिन बन गईं और उन पर इतने जुल्म के बाद भी उन्हें कुछ नहीं हुआ. वो तीनों दीदी के हाथों गुलामों की तरह क्यों पिट रहे थे.

दीदी की अलमारी से मुझे कुछ सीडी मिलीं. मैंने उनको जल्दी से लिया और छुप कर बाहर आ गया और दीदी को जगा कर अपने कमरे में जाकर सोने को कहा.

दीदी के जाने के बाद मैंने उन सीडी को अपने कंप्यूटर में लगाया. पहली सीडी में दीदी उसी फार्म हाउस में एक गुलाम को कोड़े मार रही थीं. साथ में उस गुलाम की बीवी भी थी, जो बैठ के इस तमाशे को देख कर खुश हो रही थीं.

मैं इसे समझ नहीं पाया और अगली सीडी लगा दी. अगली सीडी में दीदी एक पहलवान नुमा हब्शी जैसे गुलाम की पीठ पर सवारी कर रही थीं. दीदी के बूट में लगे नुकीली कीलों की मार से गुलाम की गांड पर कट आ गए थे, जिससे खून रिस रहा था.

अगली सभी सीडी को देख कर मैंने 3 बार अपना लंड हिला कर माल निकाला.

मैंने गौर किया कि दरअसल सभी सीडी में दिख रहे गुलाम, दीदी के ऑफिस में काम करने वाले शादीशुदा मर्द थे. पर मैं ये नहीं समझ पा रहा था कि दीदी कैसे उन सभी पर जुल्म करती हैं, जिसे वो सहते हैं.

मैंने रात भर नेट पर ऐसी क्रूर औरतों के बारे में सर्च किया और ये जाना कि ऐसी औरतों को मिस्ट्रेस या मालकिन कहते हैं. जो अपने ख़ुशी के लिए गुलाम रखती हैं और उन्हें बेदर्दी से पीटती हैं.

क्या पूरा ऑफिस ही दीदी का गुलाम था? ये बात पूरी रात मेरे दिमाग में घूमती रही और मैंने अब ठान लिया था कि मैं भी दीदी का ऐसा ही गुलाम बनके उनकी सेवा करूंगा.

इसके लिए मुझे जल्दी ही मौका मिल गया.

अगले दिन जब मैं सुबह सो कर उठा तो अपने सामने दीदी को नंगा खड़ा पाया. पहले तो मुझे भरोसा ही नहीं हुआ. मुझे लगा कि शायद मैं अब भी नींद में ही हूँ.
मैंने अपने गाल पर एक चिकोटी काटी तो अहसास हुआ कि ये हकीकत है.
अब मैंने दीदी की तरफ देखा तो वे मुस्कुरा रही थीं और अपनी कमर पर हाथ रखे हुए मुझे अपनी चूचियां दिखा रही थीं.
मेरी गांड फट गई.

फिर दीदी ने कहा- साले, रात को मेरी सीडी देख कर मुठ मार रहा था.. अब क्या हुआ?
मेरी सब समझ में आ गई कि दीदी भी मुझसे चुदाना चाहती हैं.

मैंने अपनी बाँहें पसार दीं और उनसे कहा- दीदी, मैं आपके साथ सीडी वाला सेक्स करना चाहता हूँ.
दीदी बोलीं- ठीक है चल पहले तू अपने कपड़े उतार दे और मेरे कमरे में आ जा.

दीदी मेरे कमरे से चली गईं. मैं झट से उठा और अपने कपड़े उतार कर नंगा होकर दीदी के कमरे में आ गया.
उधर देखा तो कलेजा हलक में आ गया. दीदी के हाथ में एक हंटर था. उन्होंने मुझे देखा और हंटर लहराते हुए कहा- चल बहन के लंड, आज तेरी माँ चोदती हूँ.. जल्दी से कुत्ता बन जा.

मैं झट से कुत्ता जैसा बन गया और दीदी के सामने जीभ लपलपाता हुआ भौंकने लगा. दीदी ने मेरे चूतड़ों पर एक हंटर मारा तो मुझे उसकी चोट से दर्द की जगह मजा आया.
मैंने और जोर से जीभ निकाल कर भौंकना शुरू कर दिया.

बस अगले दस मिनट तक मेरी चमड़ी लाल हो गई लेकिन मजे की बात ये थी कि मुझे इस खेल में मजा रहा था.
फिर दीदी ने बेड पर बैठ कर मुझसे कहा- चल साले मेरी चूत चाट.
मैं झट से दीदी की चूत चाटने लगा.

कुछ ही मिनट बाद दीदी ने कहा- आज तेरा पहली बार है इसलिए मुझे तेरे लंड से चुदने की जल्दी मच रही है. चल अब तू अपना लंड मेरी चूत में पेल दे.
मैंने एक पल की भी देर नहीं की और अपना मूसल लंड दीदी की चूत में पेल दिया. दीदी की उम्म्ह… अहह… हय… याह… आह.. निकल गई और अगले बीस मिनट तक धकापेल चुदाई हुई.

इसके बाद मैं दीदी की चूत में झड़ गया और वहीं निढाल होकर सो गया.

दो घंटे बाद जब मैं उठा तो मैं दीदी के साथ नंगा ही लेटा था और दीदी भी नंगी ही थीं.

इसके बाद तो रोज का नियम सा बन गया था कि मैं दीदी की सेवा करता और वे मुझे तरह तरह से प्रताड़ित करते हुए मुझे अपनी चूत की चुदाई करवा लेतीं.
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